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कविता --धूप

                                        धूप बाहर  बिखरी है सुनहली धूप खूब भर-भर के लेकिन अन्दर कमरे में लगभग नाप-तौल के सिर्फ़ खिड़की की लम्बाई और चौड़ाई भर बंध गई है वह भी एक निश्चित आकार में फ़र्श पर उभरती है ठीक वैसी ही आकृति ढाली गई है जैसी लोहे की सलाखों में मिलती है रौशनी उतनी ही लेना चाहते हम जितनी ही अलग-अलग खाँचे सबके और अलग आकार हैं I       ....       ©चंद्रलेखा

कविता -- प्यारी मुस्कान

  चढ़ती धूप सी गुनगुनाती ख़ामोश लजाती  आँखों की  कोरों से झर जाती धीरे -धीरे साँझ की  सुरमई बन सिमट जाती रात की  आहट-सी  फिर सहमकर रख तुम्हारे काँधे  पर सर सो जाती चुपचाप  प्यारी मुस्कान …  ------------    ©चंद्रलेखा

कविता : अनसुलझे सवाल

अनसुलझे  सवाल              आसमान का चूल्हा ये, जलता नहीं है आज क्यों,

कविता :-'ज़रूरी तो नहीं '

'ज़रूरी तो नहीं .....' जिंदगी में जीने के लिए ज़रूरी है साँसे किन्तु; साँसे ही जिंदगी हों , ज़रूरी तो नहीं .

मौसम आते है ....

चित्र
  मौसम आते है .... मौसम की नयी सुबह फिर से गुनगुनाने लगी पड़ों की नंगी हो चुकी शाखाओं के पीछे, धीरे से उभरने लगा सुर्ख लाल नवाब . मौसम की ठंडक कम हो चुकी थी हवा में फिर भी कुहासे की नमी थी , पहले से तय नहीं किया था ,किन्तु पार्क में न जाकर आज मैंने  इमारतों के झुरमुटों को  आज सैर के लिए चुना था . गगन चुम्बी इमारतों  से आसमान को ढकने वाली रातों में तारों को ढूँढने की इच्छा  भीतर ही भीतर चुप सोयी पड़ी थी,  सुबह का सूरज ही नहीं तारों भरा आसमान देखे हुए भी लम्बा  अरसा हो गया था . तापमान के घटने और बढ़ने के बीच सर्दी गर्मी बरसात की आहट सुनाता हुआ , महानगर में मौसम आता है अब एक समाचार  की तरह... स्वेटर जैकट कूलर और ए.सी ही एहसास करते है मौसम का , बूंदा-बंदी और गरज के साथ छीटों में  सिमटी   रह जाती है सावन के गीतों की मधुर झंकार , हरी घास के नन्हें नन्हें बादशाहों के सिरों पर झिलमिलाते  रुपहले मुकुट  चोरी हो चुकें हैं कब के ,  फूलों की नर्म पंखुड़ियों को हाथ फिरा कर जगाने से...

नटखट सा चाँद

यादों के झरोखे से झांकता हुआ मन के किसी कोने को सजाता हुआ आता है जब भी नटखट सा ये चाँद असंख्य सजीले चमकीले  छोटी छोटी किरणों के गुच्छे जगमगा उठते अनायास भर देते  है मन को  आकांक्षाओं के सागर से मचलने लगती है बाहें आगोश में  भर लेने को  आता है पर हाथ कहाँ  नटखट सा ये चाँद.. © चंद्रलेखा