कविता -- प्यारी मुस्कान
चढ़ती धूप सी
गुनगुनाती
ख़ामोश लजाती
आँखों की कोरों से
झर जाती धीरे -धीरे
साँझ की सुरमई बन
सिमट जाती
रात की आहट-सी फिर
सहमकर रख
तुम्हारे काँधे पर सर
सो जाती चुपचाप
प्यारी मुस्कान …
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©चंद्रलेखा
इच्छाओं की सजीली राह से गुज़रती, निराशा के घने बियावान जंगलों को पार करती हुई, सूखी पथरीली नदी की धार में बहती, आशाओं और अरमानों के धुंधले बादलों को छूती हुई मन की रागिनी तड़प कर जब राग कोई अनसुना सुनाने लगती है...दिल कुछ कहने को व्याकुल हो उठता है … अनायास ही हाथों में कलम ही जाती है ……और शब्द बह निकलते है …
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