नटखट सा चाँद
यादों के झरोखे से
झांकता हुआ
मन के किसी कोने को
सजाता हुआ
आता है जब भी
नटखट सा ये चाँद
असंख्य सजीले चमकीले
छोटी छोटी किरणों के गुच्छे
जगमगा उठते अनायास
भर देते है मन को
आकांक्षाओं के सागर से
मचलने लगती है बाहें
आगोश में भर लेने को
आता है पर हाथ कहाँ
नटखट सा ये चाँद..
© चंद्रलेखा
chan ko lekar aapne bahut sundar kavita prastut ki hai,pad kar achchha,badhai.
जवाब देंहटाएंअशोक जी ,
हटाएंमेरे ब्लॉग पर आने का बहुत बहुत धन्यवाद . आपने कविता पढ़ी और सराहना की , इसके लिए और उत्साहवर्धन के लिए हृदय से आभारी हूँ ..