मौसम आते है ....

मौसम आते है ....
मौसम की नयी सुबह
फिर से गुनगुनाने लगी
पड़ों की नंगी हो चुकी
शाखाओं के पीछे, धीरे से
उभरने लगा सुर्ख लाल नवाब .
मौसम की ठंडक कम हो चुकी थी
हवा में फिर भी कुहासे की नमी थी ,
पहले से तय नहीं किया था ,किन्तु
पार्क में न जाकर आज मैंने
इमारतों के झुरमुटों को
आज सैर के लिए चुना था .
गगन चुम्बी इमारतों से
आसमान को ढकने वाली रातों में
तारों को ढूँढने की इच्छा
भीतर ही भीतर चुप सोयी पड़ी थी,
सुबह का सूरज ही नहीं
तारों भरा आसमान देखे हुए भी
लम्बा अरसा हो गया था .
तापमान के घटने और बढ़ने के बीच
सर्दी गर्मी बरसात की आहट सुनाता हुआ ,
महानगर में मौसम आता है
अब एक समाचार की तरह...
स्वेटर जैकट कूलर और ए.सी ही
एहसास करते है मौसम का ,
बूंदा-बंदी और गरज के साथ छीटों में
सिमटी रह जाती है
सावन के गीतों की मधुर झंकार ,
हरी घास के नन्हें नन्हें
बादशाहों के सिरों पर
झिलमिलाते रुपहले मुकुट
चोरी हो चुकें हैं कब के ,
फूलों की नर्म पंखुड़ियों को
हाथ फिरा कर जगाने से पहले ही
ढल जाती है सुबह की धूप.
सप्तर्षि और ध्रुव तारों के बीच
जाने कहाँ गुम हो गए हैं
किस्सा भरी रातों के रहस्य .
महानगर में मौसम की चर्चा होती है
बस .... गणित की तरह ....
धूप धुंध और हवा से लड़ कर
कब्ज़ा कर लेने वाली
जिद्दी सभ्यता ने
मौसम बदले हैं
अपनी मर्ज़ी से ,
अपनी रफ़्तार से .
भरमाया हुआ सा मौसम
सहम सा गया है ,
न खिलता है न मुरझाता
क्यों कि; उसे
परम्पराओं ने नहीं
मशीनों ने गढ़ा है ...
महानगर में वसंत हेमंत पतझड़ सावन
आते तो हैं ,किन्तु
बिना दस्तक दिए
और फिर लौट जाते है
अलविदा कहे बिना ही
महानगर में मौसम पहचाने जाते है
ग्रीटिंग कार्ड और कैलेंडरों से
जो बस टंगे रहते है या
भेंट दे दिए जाते है .
संवेदनाओं के तारों को
छू कर दिलों में
उतर नहीं पाते अब
महानगर के मौसम....
©चंद्रलेखा
aabhar poonam ji
जवाब देंहटाएंआभार तो आपका नवीन मनि जी कि आपने समय निकल कर कविता को पढ़ा . धन्यवाद।
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंराकेश जी ,आपका बहुत धन्यवाद कि आपको कविता पसंद आई। आगे भी इसी प्रकार का प्रोत्साहन मिलने की आशा करती हूँ।
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