कविता --धूप

                     

                धूप


बाहर  बिखरी है सुनहली धूप

खूब भर-भर के

लेकिन

अन्दर कमरे में

लगभग नाप-तौल के

सिर्फ़ खिड़की की लम्बाई और चौड़ाई भर

बंध गई है वह भी

एक निश्चित आकार में

फ़र्श पर उभरती है

ठीक वैसी ही आकृति

ढाली गई है जैसी

लोहे की सलाखों में

मिलती है रौशनी उतनी ही

लेना चाहते हम जितनी ही

अलग-अलग खाँचे सबके

और अलग आकार हैं I

      ....

      ©चंद्रलेखा

टिप्पणियाँ

  1. खिड़की का विवरण देकर आपने स्वयं को बड़ी खूबसूरती से छायावादी शैली में निरुपित किया है 👌.

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